आयुर्वेद क्या है

आयुर्वेद दो शब्दों से मिलकर बना है आयुष और वेद। विश्व की सबसे पुराणी चिकित्सा प्रणाली आयुर्वेद ही है। इसका अर्थ होता है जो जीवन का ज्ञान कराता हो और विज्ञान, कला और दर्शन का मेल हो वही आयुर्वेद है। आयुर्वेद का रचयिता का श्रेय अश्विनी कुमारो को जाता है उन्होंने ने ही इसकी रचना की थी। आयुर्वेदिक नुस्खे सबसे अचूक उपाय माने जाते है।

आयुर्वेद और एलोपैथी में अंतर: 

आयुर्वेद पूरी तरह से प्राकृतिक उपचार है जो वैध-मुनियों द्वारा किया जाता था लेकिन एलोपैथी जिसे हिंदी में आयुर्विज्ञान कहा जाता है आयुर्वेद का हिस्सा माना जाता है जिसे चिकित्सको (डॉक्टर्स) द्वारा इलाज किया जाता है। इसके लिए डॉक्टर एलोपैथी की पढाई करते है। आयुर्वेद हमरी लाइफ एनर्जी के सामान है।

आयुर्वेद के प्रकार: 

आयुर्वेद चिकित्सा को 8 अलग अलग विभागों में बांटा गया है:

  • कायचिकित्सा (General Medicine): इस विभाग में रोगी का इलाज आयुर्वेदिक दवाइयों से किया जाता है।
  • शल्यतंत्र (Surgery and Midwifery): शल्य चिकित्सा में शरीर के अंगो को निकलने और उनमे बदलाव करने का विभाग शल्यतंत्र में आता है। इस पद्दति में शास्त्र, यंत्र, क्षार आदि का प्रयोग किया जाता है।
  • शालाक्यतंत्र (Opthamology including ENT and Dentistry): केवल पुरे सर अथवा खोपड़ी के इलाज का विभाग शालाक्यतंत्र में आता है। इसमें गले से ऊपर के हिस्से में होने वाले इलाज को शामिल किया जाता है। जिसमे आँखे, नाक, कान, मुंह और दांत का इलाज शामिल है।
  • कौमारभृत् (Pediatrics): इसमें छोटे बच्चो और गर्भवती स्त्रियों के इलाज का विभाग आता है साथ ही स्त्री रोग से जुड़े सभी इलाज कौमारभृत्य विभाग का ही हिस्सा है।
  • अगदतंत्र: इस विभाग में बेहद ही जटिल और कृतिम जहर के लक्षण और उसके इलाज को शामिल किया गया है।
  • भूतविद्या (Psycho-therapy): इस विभाग में ग्रहों के प्रभाव से होने वाले रोगों के इलाज के विषय में बताया गया है।
  • रसायनतंत्र (Rejenation and Geriatrics): इस विभाग में बढती हुई उम्र के बावजूद किस तरह से आप स्वस्थ और हमेशा युवा वस्था के सामान रह सकते है उसका वर्णन किया गया है और बुढ़ापे में होने वाले रोगों से किस प्रकार बचाव कर सकते है।
  • वाजीकरण (Virilification, Science of Aphrodisiac and Sexology): सेक्स से सम्बंधित बीमारियां और उसका इलाज वाजीकरण विभाग में आता है।

आयुर्वेदिक उपचार:

आयुर्वेद के अनुसार किसी भी व्यक्ति में तीन तरह के रोग पाए जाते है। वात रोग(promise), कफ (Cough) और पित्त रोग( bile )। आयुर्वेद आपके शरीर को रोगों से बचाता तो है साथ ही आयुर्वेदिक दवाईयां आपके रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ावा देता है। आयुर्वेदिक उपचार से शरीर में हर चीज़ का संतुलन बनता है और खासकर के शरीर में वात, कफ और पित्त रोग का संतुलन आवश्यक है।

क्या होते है वात, कफ और पित्त रोग:

  •  वात रोग: वात रोग में वायु और आकाश तत्व से जुड़े रोग प्रबल होते है।
  • कफ: कफ में पृथ्वी और जल तत्व से जुड़े रोग बढ़ते है।
  • पित्त दोष: पित्त दोष में अग्नि तत्व से जुड़े रोग शरीर में सक्रीय होने लगते है।

आयुर्वेद केवल चिकित्सा तक ही सिमित नहीं है। ये जीवन को स्वस्थ तरीके से जीने की कला भी सिखाता है। आयुर्वेद के जरिये पुराने से पुराने रोग से निजात पायी जा सकती है। आयुर्वेद का आरम्भ भले ही भारत में हुआ है लेकिन आज के समय में आयुर्वेद पूरी दुनिया में फ़ैल चुकी है। लोग आयुर्वेदिक तरीके से इलाज को ही सबसे बेहतर मानने लगे है।

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